भोलाराम के जीवन की कहानी - Hindi Quotes

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Friday, May 8, 2020

भोलाराम के जीवन की कहानी

ऐसा कभी नहीं हुआ था. धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास स्थान, अलोट करते आ रहे थे, पर ऐसा कभी नहीं हुआ था. सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर देख रहे थे. गलती पकड़ नहीं आ रही थी. आखिर उन्होंने खोजकर रजिस्टर इतने जोर से बंद किया कि मक्खी चपेट में आ गई| उसे निकालते हुए वे बोले महाराज रिकार्ड सब ठीक है. भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा.



धर्मराज ने पूछा – और वह दूत कहाँ है?

महाराज वह भी लापता है.

उसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बड़ा बदहवास यहाँ आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, अरे तू कहाँ रहो इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है? यमदूत हाथ जोड़कर बोला. दयानिधान मैं कैसे बतलाऊ. कि क्या हो गया? आज तक मैंने धौखा नहीं खाया था, पर भौलारम का जीव मुझे चकमा दे गया. ५ दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह को त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक ही यात्रा आरम्भ की. नगर के बाहर ज्यो ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु तरंग पर सवार हुआ त्यों ही वह मेरे चंगुल से छुटकर न जाने कहाँ गायब हो गया. इन ५ दिनों में मैंने सारा ब्रह्मांड छान डाला, पर उसका कहीं पता नही चला.

धर्मराज क्रोध से बोले मुर्ख जीवो को लाते-लाते बुढा हो गया, फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया.

दूत ने सिर झुकाकर कहाँ महाराज मेरी सावधानी में बिलकुल कसार नही थी. मेरे इन अभ्यस्थ हाथो से अच्छे – अच्छे बकील भी नहीं छूट सके पर इस बार तो कोई इंद्रजाल ही हो गया.

चित्रगुप्त ने कहा महाराज आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है. लोग दोस्तों को कुछ भेजते है और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते है. हौजरी के पार्सलों के मोज़े रेलवे अफसर पहनते है. मालगाड़ी के डिब्बे के डिब्बे रास्ते में कट जाते है. एक बात और हो रही है. राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बंद कर देते है कहीं भोलाराम की जीव को भी तो किसी विरोधी दल ने मरने के बाद दुर्गति के लिए तो नही उड़ा दिया?

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की और देखते हुए कहा कि तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गई. भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना देना? इसी समय कहीं से घूमते घामते नारद मुनि वहाँ आ गए. धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले, क्यों धर्मराज कैसे चिंतित बैठे है? क्या नरक में निवास स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?

धर्मराज ने कहाँ वह समस्या तो कभी की हल हो गई नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए है. कई इमारतो के ठेकेदार है, जिन्होंने पुरे पैसे लेकर रद्दी इमारते बनाई. बड़े-बड़े इंजीनियर भी आ गए है, जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा हडप्पा जो कभी काम पर गए ही नहीं. इन्होने बहुत जल्दी नरक में कई इमारते तान दी है. वह समस्या तो हम हो गई. पर एक बड़ी विकट उलझन आ गई है. भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई. इसने सारा ब्रह्मांड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला. अगर ऐसा होने लगा, तो पाप पूण्य का भेद ही मिट जाएगा.

नारद जी ने पूछा उस पर इन्कम टेक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगो ने रोक लिया हो.

चित्रगुप्त ने कहा इनकम होती तो टेक्स होता. भुखमरा था.

नारद बोले मामला बड़ा दिलचस्प है. अच्छा मुझे उसका नाम, पता तो बताओ मैं पृथ्वी पर जाता हूँ.

चित्रगुप्त ने रजिस्टर खोलकर बताया. भोलाराम नाम था उसका. जबलपुर शहर में घमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे के टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था. उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के एक लड़की. उम्र लगभग साठ साल. सरकारी नौकर था. ५ साल पहले रिटायर हो गया था. मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इसलिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था. इतने में भोलाराम ने संसार ही छौड़ दिया. आज ५ दिन है. बहुत सम्भव है कि अगर मकान मालिक वास्तविक मकान मालिक है तो उसने भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा. इसलिए आपको परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा.

माँ बेटी के सम्मिलित क्रन्दन से ही नारद भौलारम का मकान पहचान गए. द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगाईं, नारायण – नारायण लड़की ने देखकर कहा आगे जाओ महाराज. नारद ने कहा, मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है. अपनी माँ को जरा बाहर भेजो, बेटी.

भोलाराम की पत्नी बाहर आई. नारद ने कहा माता भोलाराम को क्या बीमारी थी?

क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी ५ साल हो गए, पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली. हर दस पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से यही जवाब मिलता, विचार हो रहा है. इन ५ सालो में सब गहने बेचकर हम लोग खा गए. फिर बर्तन बिके. अब कुछ नहीं बचा था. फाके होने लगे थे. चिंता में घूमते घूमते और भूखे मरते मरते उन्होंने दम तौड दिया.

नारद ने कहा क्या करोगी माँ? उनकी इतनी ही उम्र थी. ऐसा तो मत करो, महाराज? उम्र तो बहुत थी. ५० – ६० रुपया महिना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं से करके गुजारा हो जाता. पर क्या करे? ५ साल नौकरी से बैठे हो गए और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली.

दुःख की कथा सुनने की फुर्सत नारद को थी नहीं. वे अपने मुद्दे पर आये. माँ यह तो बताओ कि यहाँ किसी को उनमे विशेष प्रेम था, जिसमे उनका जी लगा हो. पत्नी बोली लगाव तो महाराज बाल बच्चो से होता है. नहीं परिवार के बाहर भी हो सकता है. मेरा मतलब है. किसी स्त्री,

स्त्री ने गुर्राकर नारद की और देखा. बोली हर कुछ बको महाराज तुम साधु हो. जिन्दगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री को आँख उठाकर नहीं देखा.

नारद हँसकर बोले हाँ तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है. यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है. अच्छा माता मैं चला.

स्त्री ने कहा महाराज आप तो साधू है, सिंद्ध पुरुष है. कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाए. इन बच्चो का पेट कुछ दिन भर जाए.

नारद को दया आ गई थी. वे कहने लगे. साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं. फिर भी मैं सरकारी दफ्तर में जाऊँगा और कौशिश करूँगा.

यहाँ से चलकर नारद सरकारी दफ्तर पहुँचे. वहाँ पहले ही कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें की. उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला भोलाराम ने दरख्वास्ते तो भेजी थी, पर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होगी.

नारद ने कहा भई. ये बहुत से पेपर वेट तो रखे है. इन्हें क्यों नही रख दिया.

बाबू हँसा आप साधू है. आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती. दरख्वास्ते पेपर वेट से नहीं दबती खेर आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए.

नारद उस बाबू के पास आये. उसने तीसरे बाबू के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास, चौथे ने पांचवे के पास. जब नारद पच्चीस तीस बाबुओ और अफसरों के पास घूम आये तब एक चपरासी ने कहा. महाराज आप क्यों इस झंझट में पड़ गए. आप अगर साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा. आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए. उन्हें खुश कर लिया. तो आपका अभी काम हो जाएगा.

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुंचे. बाहर चपरासी ऊँघ रहा था. इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं. बिना विजिटिंग कार्ड के आया देख साहब बड़े नाराज हुए. बोले इसे कोई मंदिर वन्दिर समझ लिया है क्या? धड-धडाते चले आये. चिट क्यों नही भेजी?

नारद ने कहा कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है.

क्या काम है? साहब ने रौब से पूछा.

नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया.

साहब बोले आप है बैरागी. दफ्तरों के रीती रिवाज नहीं जानते. असल में भोलाराम ने लगती की. भई सरकारी पैसे का मामला है. पेंशन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है. देर लग ही जाती है. जितनी पेंशन मिलती है. उतनी ही स्टेशनरी लग जाती है, हाँ जल्दी भी हो सकता है, मगर साहब रुके.

नारद ने कहा मगर क्या?

साहब ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा – मगर वजन चाहिए. आप समझे नहीं जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वजन भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है. मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है. यह मैं उसे दूँगा. साधू संतों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते है.

नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराये पर फिर सम्भलकर उन्होंने वीणा टेबल पर रखकर कहा यह लीजिये. अब जरा जल्दी उसकी पेंशन का आर्डर निकाल दीजिए.

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई. चपरासी हाजिर हुआ.

साहब ने हुक्म दिया – बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ.

थोड़ी ही देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ डेढ़ सौ दरख्वास्तो से भरी फाइल लेकर आया. उसमे पेंशन के कागजात भी थे साहब ने फाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा. क्या नाम बताया साधु जी आपने? नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनते है इसलिए जोर से बोले भोलाराम. सहसा फाइल ने से आवाज आई, कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?

नारद ने कहा मैं नारद हूँ मैं तुम्हे लेने आया हूँ. चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है. आवाज आई, मुझे नहीं जाना. मैं तो पेंशन की दरख्वास्तो में अटका हूँ. यही मेरा मन लगा है. अपनी दरख्वास्तें छौड़कर नहीं जा सकता.

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