परोपकार भावना | तुलसीदासजी का प्रसंग - Hindi Quotes

Breaking

All Hindi content in one blog!

Friday, May 8, 2020

परोपकार भावना | तुलसीदासजी का प्रसंग

परोपकार भावना

परोपकार भावना एक पवित्र भावना है. मनुष्य वास्तव में वही है जो दूसरों का उपकार करता है. यदि मनुष्य में दया, ममता परोपकार और सहानुभूति की भावना न हो तो पशु और मनुष्य में कोई अंतर नही रहता. मैथलीशरण गुप्त के शब्दों में, मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे. मनुष्य का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने विषय में न सोचकर दूसरों के विषय में ही सोचे, दूसरों की पीड़ा हरे, दूसरों के दुःख दूर करने का प्रयत्न करे.

गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि परहित सरस धर्म नहीं भाई, दूसरों की भलाई करने से अच्छा धर्म नही है. दूसरों को पीड़ा पहुँचाना पाप है और परोपकार करना पूण्य है.

परोपकारशब्द पर उपकार से मिलकर बना है. स्वयं को सुखी बनाने के लिए तो सभी प्रयत्न करते है परन्तु दूसरों के कष्टों को दूर कर उन्हें सुखी बनाने का कार्य जो सज्जन करते है वे ही परोपकारी होते है. परोपकारएक अच्छे चरित्रवान व्यक्ति की विशेषता है.
परोपकारस्वयं कष्ट उठाता है लेकिन दुखी और पीड़ित मानवता के कष्ट को दूर करने में पीछे नहीं हटता. जिस कार्य को अपने स्वार्थ की दृष्टी से किया जाता है वह परोपकार नहीं है. परोपकारव्यक्ति अपने और पराये का भेद नही करता. वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं काम ने नही लेती. चन्दन अपनी सुगंध दूसरों को देता है.

सूर्य और चन्द्रमा अपना प्रकाश दूसरों को देते है. नदी, कुएँ और तालाब दूसरों के लिए है. यहाँ तक कि पशु भी अपना दूध मनुष्य को देते है और बदले में कुछ नही चाहते, यह है परोपकारभावना, इस भावना के मूल के स्वार्थ का नाम भी नहीं है.

भारत तथा विश्व का इतिहास परोपकार के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है. स्वामी दयानंद, महात्मा गाँधी, ईसा मसीहा, दधीचि, स्वामी विवेकानंद, गुरु नानक सभी महान परोपकारी थे. परोपकारभावना के पीछे ही अनेक वीरों ने यातनाये सही और स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर चढ़ गए अपने जीवन का त्याग किया और देश को स्वतंत्र कराया. परोपकार एक सच्ची भावना है. यह चरित्र का बल है. यह निस्वार्थ सेवा है यह आत्मसमर्पण है. परोपकार ही अंत में समाज का कल्याण करता है. उनका नाम इतिहास में अमर होता है.

No comments:

Post a Comment